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पूर्णिमा पर आज शाम दिखाई देगा ‘स्‍ट्रॉबेरी मून’, जानें इसके बारे में सबकुछ

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चंद्रमा आज बेहद खास अंदाज में हमारे सामने आने वाला है। आज शाम पूर्णिमा पर चांद का जो रूप नजर आएगा उसे दुनिया में स्‍ट्रॉबेरी मून (Strawberry Moon) के नाम से जाना जाता है, लेकिन खास बात यह है कि आज चांद ना तो स्‍ट्रॉबेरी के जैसा दिखाई देगा, ना ही उसकी चमक में गुलाबीपन होगा, फ‍िर भी इसे स्‍ट्रॉबेरी मून कहने के पीछे लॉजिक है। यह हम आपको आगे बताएंगे, लेकिन उससे जरूरी बात यह है कि भारतीय समय के अनुसार पूर्णिमा पर चांद का दीदार शाम 5.22 बजे से किया जा सकेगा। आज चंद्रमा, पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा में निकटतम बिंदु पर होगा। इसे पेरिगी (perigee) कहा जाता है। इसी वजह से चंद्रमा ‘सुपरमून' जैसा दिखाई देगा। एक्‍सपर्ट के मुताबिक, इस दौरान चंद्रमा का आकार बड़ा और चमकीला नजर आता है। आसामान साफ होने पर इसकी चमक देखते ही बनती है।    पृथ्‍वी के 26 हजार किलोमीटर नजदीक आएगा चांद  रिपोर्टों के अनुसार, पृथ्‍वी और चंद्रमा के बीच की जो दूरी है, मंगलवार को वह करीब 26 हजार किलोमीटर कम हो जाएगी। जैसा कि हमने आपको बताया आज चंद्रमा, पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा में निकटतम बिंदु पर होगा। इसे पेरिगी कहा ज...

भारत में लगा दुनिया का पहला लिक्विड मिरर टेलीस्‍कोप, जानें इसके बारे में

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देश और दुनिया का पहला लिक्विड मिरर टेलीस्‍कोप (liquid mirror telescope) उत्तराखंड में लगाया गया है। नैनीताल में स्थित देवस्‍थल ऑर्ब्‍जेवट्री में एक पहाड़ी के ऊपर इस टेलीस्‍कोप को सेटअप किया गया है। बताया जाता है कि इस टेलीस्‍कोप के जरिए अंतरिक्ष में सुपरनोवा, गुरुत्वीय लेंस और एस्‍टरॉयड आदि की जानकारी लेने में मदद मिलेगी। इंडियन लिक्विड मिरर टेलीस्कोप (ILMT) आसमान का सर्वे करने में मदद करेगा। इससे कई आकाशगंगाओं और अन्य खगोलीय सोर्सेज को ऑब्‍जर्व करना भी आसान हो जाएगा।     क्‍या है लिक्विड मिरर टेलीस्‍कोप (ILMT) इसे भारत ने बेल्जियम और कनाडा के खगोलविदों की मदद से बनाया है। यह तरल पारे की एक पतली फिल्म से बना 4 मीटर व्यास का रोटेटिंग मिरर जैसा है, जो प्रकाश को इकट्ठा करने और उस पर फोकस करने का काम करता है। इसे समुद्र तल से 2450 मीटर की ऊंचाई पर देवस्‍थल ऑब्‍जर्वेट्री में लगाया गया है। यह ऑब्‍जर्वेट्री आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट ऑफ ऑब्‍जर्वेशनल साइंस (एरीज) में स्थित है, जो भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस का ऑटोनॉमस इंस्टिट्यूट है।  Unique Liquid-Mirror Telescope- built by astro...

सबसे बड़ी दूरबीन जुलाई से खोलेगी ब्रह्मांड के रहस्‍य, जानें इसके बारे में

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जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope) इस साल जुलाई से अपना काम शुरू कर देगा और दुनिया को ब्रह्मांड की बेहतरीन तस्‍वीरें देखने को मिलेंगी। प्रोजेक्‍ट से जुड़े एक एस्‍ट्रोनॉमर ने यह बात कही है। यह अंतरिक्ष में भेजा गया अबतक का सबसे बड़ा और महंगा टेलीस्‍कोप है। पिछले साल दिसंबर में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) ने इसे लॉन्‍च किया था। जेम्‍स वेब टेलीस्‍कोप वहां हबल स्‍पेस टेलीस्‍कोप की जगह लेगा, जो साल 1992 से सर्विस दे रहा है और दुनिया को ब्रह्मांड के रहस्‍यों से रू-ब-रू करवा रहा है। एक न्‍यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, यह टेलीस्‍कोप बीते 5 महीनों से अपने इंस्‍ट्रूमेंट्स को तैयार कर रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों ने यह जानकारी नहीं दी कि फ‍िलहाल इस टेलीस्‍कोप के कैमरों को कहां पॉइंट किया गया है। बाल्टीमोर में स्पेस टेलीस्कॉप साइंस इंस्टि‍ट्यूट के एक वैज्ञानिक क्लॉस पोंटोपिडन ने कहा कि हम वास्‍तव में हैरान होना चाहेंगे।  पोंटोपिडन ने कहा कि जेम्‍स वेब की टीम इस टेलीस्‍कोप द्वारा टेस्टिंग के तौर पर ली गई कुछ इमेजेस को रिलीज कर चुकी है, लेकिन नई तस्‍वीरों में एस्‍ट्...

अंतरिक्ष की सबसे बड़ी दूरबीन ने ली थी ब्‍लैक होल की यह तस्‍वीर, जानें इसके बारे में

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हबल स्पेस टेलीस्कोप ने कई बीते साल से ब्रह्मांड की हैरान करने वाली तस्‍वीरों को कैद किया है। इसने हमें एक ऐसी दुनिया की झलक दिखाई है, जिसकी कल्पना भी हममें से कई लोगों ने नहीं की होगी। पृथ्‍वी से सैकड़ों प्रकाश-वर्ष दूर होने वाली गतिविधियों को इसने हम तक पहुंचाया है, जिसमें से कई तो बेहद यादगार हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) कुछ समय के अंतराल में ऐसी तस्‍वीरों को शेयर करती रहती है, जो अतीत में ली गई हैं। इस बार भी हबल टेलीस्‍कोप की ‘फ्लैशबैक फ्राइडे' सीरीज के रूप में एक ऐसी ही तस्‍वीर को नासा ने शेयर किया है। नासा ने जो तस्‍वीर शेयर की है, उसमें हबल टेलीस्‍कोप ने आकाशगंगाओं के केंद्रों पर धूल से भरे ब्लैक होल की डिस्क को कैप्चर किया है। हबल की साइट के अनुसार, पहली इमेज में NGC 4261 नाम की एक अंडाकार आकाशगंगा है। तस्‍वीर में इसके केंद्र में स्थित ब्लैक होल को फ्यूल पहुंचाने वाली ठंडी गैस की धूल की विशालकाय डिस्क दिखाई देती है। यह आकाशगंगा लगभग 100 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित है।   खगोलविदों का अनुमान है कि इसकी डिस्क लगभग 300 प्रकाश वर्ष चौड़ी है। इसके चमकीले कोर का ...

पृथ्‍वी से 3000 प्रकाश वर्ष दूर मिला ‘ब्लैक विडो’ स्‍टार, जानें इसके बारे में

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हमारा ब्रह्मांड रहस्यों से भरा है, जहां लाखों ऑब्‍जेक्‍ट्स घूम रहे हैं। हमारी आकाशगंगा में ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जो छुपी हुई हैं। हम उनमें से बहुत कम के बारे में जानते हैं। हालांकि वो हमारे जीवन को किसी ना किसी रूप में प्रभावित करती हैं। इन पर स्‍टडी करने की कोशिशें होती रही हैं। ऐसे ही एक ऑब्‍जेक्‍ट का पता खगोलविदों ने लगाया है, जो पृथ्‍वी से लगभग 3,000 से 4,000 प्रकाश वर्ष दूर है। इससे रहस्यमयी रोशनी निकलती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चीज एक ‘ब्लैक विडो' स्‍टार हो सकती है, जो तेजी से घूमने वाला पल्सर या न्यूट्रॉन तारा हो सकता है। यह ऐसा तारा होता है, जो अपने छोटे और सहयोगी तारे को धीरे-धीरे खाकर पनपता है। ब्लैक विडो स्टार काफी दुर्लभ हैं। खगोलविद मिल्की वे यानी हमारी आकाशगंगा में ऐसे सिर्फ दो दर्जन स्‍टार का ही पता लगा पाए हैं। मैसाचुसेट्स इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी (MIT) के रिसर्चर्स ने इस नए ब्‍लैक विडो स्‍टार का पता लगाया है। उनका मानना ​​है कि यह उन सभी ब्‍लैक विडो स्‍टार में सबसे अजीब और अनोखा ब्लैक विडो पल्सर हो सकता है। इसका नाम ZTF J1406+1222 रखा गया है। रिसर्...

Nasa ने टेस्‍ट की ‘होलोपोर्टेशन’ तकनीक, अंतरिक्ष यात्रियों के सामने आए डॉक्‍टर, जानें इसके बारे में

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अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने बताया है कि उसने ‘होलोपोर्टेशन' (holoportation) नाम की एक कम्‍युनिकेशन टेक्‍नॉलजी को टेस्‍ट किया है। यह एक ऐसा शब्‍द लगता है, जो मानो किसी साइंस फ‍िक्‍शन मूवी से आया हो और रोजाना जिंदगी में इसकी बहुत कम प्रासंगिकता हो। हालांकि यह शब्द ‘होलोग्राम' और ‘टेलीपोर्टेशन' का कॉम्‍बि‍नेशन है। पिछले साल अक्टूबर में नासा ने इस इनोवेट‍िव 3D तकनीक का इस्‍तेमाल अपने फ्लाइट सर्जन डॉ. जोसेफ श्मिड को इंटरनेशनल स्‍पेस स्टेशन पर ‘होलोपोर्ट' करने के लिए किया था, जबकि डॉक्‍टर फ‍िजिकली पृथ्वी पर मौजूद थे। इस तकनीक के तहत डॉ श्मिड और उनकी टीम के मेंबर्स के 3D होलोग्राम बनाए गए और उन्हें स्‍पेस  स्टेशन पर ट्रांसमिट किया गया, जो अंतरिक्ष यात्रियों के साथ लाइव बातचीत के रूप में दिखाई दिया। नासा के मुताबिक, होलोपोर्टेशन कम्‍युनिकेशन, लोगों के हाई-क्‍वॉलिटी वाले 3D मॉडल्‍स को रियल टाइम में कहीं भी ट्रांसमिट करने की इजाजत देता है। अगर इसे माइक्रोसॉफ्ट के होलोलेन्स जैसे मिक्‍स्‍ड रियलिटी डिस्प्ले के साथ जोड़ा जाता है, तो यह तकनीक यूजर्स को 3D में लोगों को ...

रिसर्च में चला पता, शनि ग्रह के कई ऑरोरा को बनाती हैं इसकी हवाएं

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ऑरोरा (aurora) आकाश में बनने वाली खूबसूरत प्राकृतिक रोशनी है। यह रात के वक्‍त आमतौर पर नॉर्थ और साउथ पोल्‍स के पास देखने को मिलती है। लंबे समय से वैज्ञानिक यह मानते आए हैं कि ऑरोरा तब बनते हैं, जब सौर हवाएं पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से इंटरेक्‍ट करती हैं। ऐसा दूसरे ग्रहों पर भी होता है, लेकिन लीसेस्टर यूनिवर्सिटी (University of Leicester) के वैज्ञानिकों का दावा है कि सभी अरोरा इस घटना से नहीं बने हैं। वैज्ञानिकों को शनि ग्रह (Saturn) के नॉर्थ पोल पर ग्रहीय अरोरा बनाने वाला मैकेनिज्‍म मिला है। इसे पहले कभी देखा नहीं गया है।  तो क्‍या है वह मैकेनिज्‍म? वैज्ञानिकों का कहना है कि शनि ग्रह के कुछ ऑरोरा इस ग्रह के अपने वातावरण के अंदर घूमने वाली हवाओं से पैदा होते हैं। इस खोज ने ग्रहों के ऑरोरा को लेकर बनाए गई समझ को बदल दिया है। यह शनि के बारे में एक रहस्य को भी सुलझाता है कि हम ग्रह पर दिन की लंबाई क्‍यों नहीं माप सकते?  नासा (NASA) ने साल 1997 में कैसिनी (Cassini) को लॉन्‍च किया था, जो साल 2004 में शनि तक पहुंच गया। तब से इसने यह मापने की कोशिश की है कि यह ग्रह अपने दिन की लेंथ तय कर...

आल्प्स (Alps) में प्लास्टिक की बर्फबारी हुई, जानिए क्या है इसका कारण?

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First Published: February 3, 2022 | Last Updated:February 3, 2022 ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विटजरलैंड के शोधकर्ताओं ने पाया है कि स्विट्जरलैंड में अरबों प्लास्टिक के कण बर्फ के साथ गिरे हैं। ये कण हवा में 2000 किलोमीटर की यात्रा करते हैं। अध्ययन में क्या मिला? लगभग 43 ट्रिलियन प्लास्टिक कण स्विट्जरलैंड के आल्प्स में गिरे हाँ। वे बर्फ के साथ गिरते हैं। उन्हें हवा से ले जाया जाता है। यह पाया गया है कि हर साल लगभग 3,000 टन नैनो प्लास्टिक स्विस मिट्टी में जमा हो जाती है। नैनो प्लास्टिक का प्रसार अभी भी अस्पष्ट है। सबसे सटीक अध्ययन इस अध्ययन को प्लास्टिक का सबसे सटीक अध्ययन माना जा रहा है। यह मुख्य रूप से वैज्ञानिकों द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली के कारण है। वैज्ञानिकों ने आल्प्स के होहर सोनेनब्लिक पर्वत (Hoher Sonnenblick Mountain) में हर सुबह बर्फ की ऊपरी परत को इकट्ठा किया। एकत्रित बर्फ को बड़ी सावधानी से संग्रहित किया गया था। प्लास्टिक नैनो कणों की उपस्थिति के लिए बर्फ का विश्लेषण किया गया। नैनो कणों के स्रोत का पता लगाया गया। अध्ययन के प्रमुख अवलोकन प...