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जैविक खेती के नाम पर दुनिया को 'ठगा' जा रहा MP में, राज्य में 'काग़ज़ी' हैं किसान

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कृषि विभाग कहता है कि सिर्फ 3 कंपनियों ने कपास की जैविक खेती में किसानों से अनुबंध किया है. (File Photo) भोपाल: मध्यप्रदेश ने साल 2011 में ही जैविक कृषि नीति तैयार कर उस पर अमल शुरू कर दिया था. आज दावा है कि मध्यप्रदेश न केवल जैविक कृषि लागू करने वाला देश का पहला प्रदेश है बल्कि देश में सर्वाधिक प्रमाणित जैविक कृषि क्षेत्र वाले प्रदेश का तमगा भी उसे हासिल है. लेकिन क्या इस दावे में दम है. खासकर अगर कपास की बात करें तो कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए नोडल एजेंसी-कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने हाल ही में एक प्रमुख प्रमाणीकरण एजेंसी का लाइसेंस निलंबित किया है, जिसके बाद ये सवाल और गंभीर हो गये हैं. यह भी पढ़ें हाल ही में नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रमोशन (एनपीओपी) ने अपनी जांच में पाया कि हैदराबाद की एक प्रमाणीकरण एजेंसी ने न केवल गैर-जैविक तरीकों से उत्पादिक कपास को जैविक रूप में मंजूरी दी थी, बल्कि बीटी कपास को भी जैविक रूप में प्रमाणित कर दिया. इनमें से कई उत्पादक समूह कपास का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र...

MP : अस्‍थायी कोरोना योद्धाओं को हटाने के आदेश, सरकार ने बजट में कमी बताकर झाड़ा पल्‍ला

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31 मार्च से पूरे मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में रखे गए अस्थायी डॉक्टर और पैरामेडिकल स्‍टॉफ घर पर बैठ गए. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से आया आदेश साफ कहता है कि इनके मानेदय के लिए अब बजट नहीं है, ऐसे में इनकी सेवाएं समाप्त होती हैं. PM आवास योजना को लेकर शिकायत की तो पंचायत सचिव-पुलिसकर्मी ने आदिवासी युवा को बेरहमी से पीटा शरीर पर सफेद एप्रिन और गले में स्‍टेथेस्‍कोप साथ में ढेर सारी फिक्र. डॉ चंचल शर्मा कोरोना काल में अस्थायी चिकित्सक के तौर पर नियुक्त किए गए थे. 31 मार्च 2022 को उनके काम करने का आखिरी दिन था. भारी मन से अस्पताल से घर जा रहे डॉ. शर्मा कहते हैं "जब हाहाकार मचा था तो हमारे साथ लैब टेक्निशियन, आयुष डॉक्टर सब थे, लोग नहीं थे तब हम सेवाएं दे रहे थे, लेकिन अब दूध में पड़ी मक्खी की तरह सरकार ने हमें निकाल दिया हम इतना चाहते हैं कि सरकार संविदा में ही सही हमें कहीं रखे."     ऐसे समय में जब लाशों को हाथ लगाने वाला भी कोई नहीं था, डॉ. सर्वेश नागर ने आयुष चिकित्सक के तौर पर अपनी सेवाएं आगर जिला अस्पताल को दीं थीं, लेकिन अब काम नहीं है. उन्‍हों...

मध्यप्रदेश में कभी भी गुल हो सकती है बत्ती, कई पावर प्लांट में कोयले की भारी किल्‍लत

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भोपाल: मध्यप्रदेश में बत्ती कभी भी गुल हो सकती है. वजह है कोयले की आपूर्ति में कमी, जिससे ताप विद्युत संयंत्रों की कई यूनिट बंद करने की नौबत आ गई है. सरकार इसे कम डिमांड या मेंटनेंस की आड़ में ढक रही है, लेकिन हकीकत में बिजली उत्पादन कम हो गया है. कई पावर प्लांट में दो से सात दिन का कोयला ही बचा है, वो भी रबी सीजन में, जब किसानों की बिजली की जरूरत होती है. राज्य के कई पावर प्लांट ऐसे हैं जहां ब्लैक आउट हो सकता है. बारिश के वक्त कम सप्लाई हुई, रेलवे पर भार है. नतीजा मध्यप्रदेश को भी भुगतना पड़ रहा है. राज्य के प्रमुख थर्मल पावर प्लांट के हालात खस्ता हैं, मसलन संजय गांधी और श्रीसिंगाजी थर्मल पावर प्लांट की एक इकाई बंद हो गई है. यह भी पढ़ें मध्यप्रदेश : घरेलू हिंसा की पीड़िताओं को मिलेगी आर्थिक मदद, कैबिनेट बैठक में हुए कई महत्वपूर्ण फैसले अमरकंटक थर्मल पावर प्लांट में रोज़ाना 4000 टन कोयले की ज़रूरत है, स्टॉक में है 8300 टन, उत्पादन होता है 210 मेगावाट, फिलहाल उत्पादन हो रहा है 149 मेगावाट. संजय गांधी थर्मल पावर प्लांट में 18000 टन रोज़ाना की ज़रुरत है, 70,000 टन स्टॉक में है, बिजली ...