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वैज्ञानिकों ने खोज निकाले पृथ्‍वी जैसे दो ग्रह, क्‍या मुमकिन होगी एक और दुनिया?

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पृथ्‍वी से बाहर जीवन की खोज और पृथ्‍वी जैसे ग्रहों की तलाश में वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। इसी कड़ी में नई कामयाबी हाथ लगी है। पृथ्‍वी जैसे दो ग्रहों वाला एक सौर मंडल हमसे काफी करीब लगभग 33 प्रकाश वर्ष दूर खोज लिया गया है। वैसे यह खोज पिछले साल अक्‍टूबर में ही हो गई थी, लेकिन साइंटिस्‍ट इसे पुख्‍ता कर रहे थे। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) के ट्रांजिटिंग एक्सोप्लेनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) ने इसे देखा था। आखिरकार 16 जून को कैलिफोर्निया में अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की एक बैठक में इसकी घोषणा की गई। इस खोज के बाद अहम सवाल यह उठता है कि क्‍या इन ग्रहों में जीवन संभव है? क्‍या पृथ्‍वी की तरह एक और दुनिया आने वाले वक्‍त में मुमकिन हो सकती है?  रिपोर्ट के अनुसार, इस सवाल का जवाब फ‍िलहाल तो ‘नहीं' में उत्‍तर देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे पड़ोसी सौर मंडल में पृथ्वी के आकार वाले कम से कम दो चट्टानी ग्रह भले मौजूद हों, लेकिन इनमें से किसी के भी जीवन की मेजबानी करने की संभावना नहीं है।  इन दो ग्रहों में से एक का नाम HD 260655b बताया गया है। यह पृथ्वी से लगभग 1.2 गुना बड़ा ...

तारों को भी लगते हैं झटके! सुनामी जैसा कंपन‍ बिगाड़ सकता है उनका आकार

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हमारी आकाशगंगा यानी मिल्‍की-वे में मौजूद तारे भी ‘कंपन' का अनुभव करते हैं। यह सुनने में अजीब लगता है, लेकिन फैक्‍ट है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि आकाशगंगा में स्थित तारे (या ग्रह) ‘स्टारक्वेक' को एक्‍सपीरियंस करते हैं। जैसे पृथ्‍वी पर सुनामी आती है, वैसा ही कुछ अभास तारों में भी होता है। दावा तो यह भी है कि ये स्टारक्वेक इतने पावरफुल हैं कि किसी तारे का आकार भी बदल सकते हैं। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के मिल्की वे-मैपिंग गैया मिशन द्वारा यह खोज की गई है।  इस खोज तक पहुंचने में गैया स्‍पेस ऑब्‍जर्वेट्री द्वारा जुटाए गए डेटा की अहम भूमिका रही। इस ऑब्‍जर्वेट्री ने लगभग दो अरब सितारों के आंकड़े जुटाए थे, जिनके आधार पर यह खोज की गई है। यूरोपीय स्‍पेस एजेंसी की ओर से बताया गया है कि पहले भी ऑब्‍जर्वेट्री को तारों में कंपन का पता चलता था। तारों में यह कंपन उनके आकार को बनाए रखने के लिए होता था। अब जिन कंपनों के बारे में पता चला है, वह सुनामी की तरह हैं।  इस ऑब्‍जर्वेशन से खगोलविदों को हमारी आकाशगंगा की संरचना का पुनर्निर्माण करने में मदद मिलेगी। वह पता लगा पाएंगे कि अरबों ...

पूर्णिमा पर आज शाम दिखाई देगा ‘स्‍ट्रॉबेरी मून’, जानें इसके बारे में सबकुछ

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चंद्रमा आज बेहद खास अंदाज में हमारे सामने आने वाला है। आज शाम पूर्णिमा पर चांद का जो रूप नजर आएगा उसे दुनिया में स्‍ट्रॉबेरी मून (Strawberry Moon) के नाम से जाना जाता है, लेकिन खास बात यह है कि आज चांद ना तो स्‍ट्रॉबेरी के जैसा दिखाई देगा, ना ही उसकी चमक में गुलाबीपन होगा, फ‍िर भी इसे स्‍ट्रॉबेरी मून कहने के पीछे लॉजिक है। यह हम आपको आगे बताएंगे, लेकिन उससे जरूरी बात यह है कि भारतीय समय के अनुसार पूर्णिमा पर चांद का दीदार शाम 5.22 बजे से किया जा सकेगा। आज चंद्रमा, पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा में निकटतम बिंदु पर होगा। इसे पेरिगी (perigee) कहा जाता है। इसी वजह से चंद्रमा ‘सुपरमून' जैसा दिखाई देगा। एक्‍सपर्ट के मुताबिक, इस दौरान चंद्रमा का आकार बड़ा और चमकीला नजर आता है। आसामान साफ होने पर इसकी चमक देखते ही बनती है।    पृथ्‍वी के 26 हजार किलोमीटर नजदीक आएगा चांद  रिपोर्टों के अनुसार, पृथ्‍वी और चंद्रमा के बीच की जो दूरी है, मंगलवार को वह करीब 26 हजार किलोमीटर कम हो जाएगी। जैसा कि हमने आपको बताया आज चंद्रमा, पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा में निकटतम बिंदु पर होगा। इसे पेरिगी कहा ज...

रिसर्च में दावा- हमारी आकाशगंगा में मौजूद हैं एलियंस की 4 सभ्‍यताएं, पृथ्‍वी पर कर सकती हैं हमला

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एलियंस हमारी दुनिया के लिए हमेशा से ही बहस का विषय रहे हैं। वैज्ञानिक इनके वजूद को ना तो नकारते हैं, ना ही पुख्‍ता तौर पर इनके होने की पुष्टि करते हैं। हमारी आकाशगंगा जिसे मिल्‍की वे भी कहते हैं, उसमें ऐसे लाखों ग्रहों के होने का अनुमान है, जो रहने लायक हो सकते हैं। अब एक नई रिसर्च से पता चलता है कि ऐसे लगभग चार ग्रह दुष्‍ट एलियन सभ्‍यताओं को शरण दे सकते हैं। ये एलियंस पृथ्‍वी पर हमला कर सकते हैं। प्रीप्रिंट डेटाबेस arXiv में इस रिसर्च को पोस्‍ट किया गया है। हालांकि इस रिसर्च पेपर को अभी तक रिव्‍यू नहीं किया गया है, पर इससे सवाल पैदा होता है कि आखिर ऐसी कौन सी संभावनाएं हैं कि इंसान एक दिन दुश्‍मन एलियंस से संपर्क कर सकता है, जो हमारे ग्रह पर हमला करने की ताकत रखते हैं।  livescience ने अपनी रिपोर्ट में रिसर्च के हवाले से लिखा है कि ऐसा मुमकिन है। स्‍टडी के इकलौते लेखक अल्बर्टो कैबलेरो स्पेन में विगो यूनिवर्सिटी में iपीएचडी के छात्र हैं। कैबलेरो कोई खगोल भौतिकीविद् नहीं हैं, लेकिन उन्होंने वाव! (Wow!) सिग्नल पर एक अध्ययन प्रकाशित किया है। वाव सिग्‍नल के बारे में भी कहा जाता है कि इ...

आज रात आसमान में हो सकती है शानदार उल्‍का बौछार, देख सकते हैं ऑनलाइन भी

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आसमान में होने वाली घटनाओं में दिलचस्‍पी रखने वाले लोगों के लिए आज और कल की रात बेहद अहम होने वाली है। 30-31 मई की रात में दुनिया एक उल्‍का बौछार (meteor shower) को एक्‍सपीरियंस कर सकती है। ताऊ हरक्यूलिड्स नाम की यह उल्‍का बौछार इसी नाम के एक तारे से आती है, जिसका मुख्‍य धूमकेतु (comet) SW3 है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) पिछले हफ्ते इस उल्‍का बौछार का अनुमान लगाया था। अगर आपके क्षेत्र में मौसम संबंधी रुकावटें हैं या फ‍िर आप रात को घर से बाहर नहीं निकलना चाहते, तब भी आप इस संभावित उल्‍का बौछार को अनुभव कर सकते हैं।   ताऊ हरक्यूलिड्स (tau Herculids) उल्का बौछार के बारे में कहा जाता है कि सोमवार की पूरी रात प्रति घंटे 1,000 ‘उल्‍का तूफान' दिखाई दे सकते हैं। इसकी वजह है कि पृथ्‍वी एक धूमकेतु SW3 के मलबे से गुजरने वाली है। हालांकि वैज्ञानिक इसके बारे में अभी तक पूरी तरह आश्‍वस्‍त नहीं हैं। अगर धूमकेतु का मलबा उससे अलग हो जाता है, तभी दुनिया एक बेहतरीन उल्‍का बौछार का अनुभव कर पाएगी। बताया जाता है कि यह पिछले 20 साल की सबसे बेहतरीन उल्‍का बौछार हो सकती है या फ‍िर कुछ भी ना द...

क्‍या हैं सौर हवाएं, सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन? समझिए इनके बीच का फर्क

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पृथ्‍वी समेत बाकी ग्रहों को ऊर्जा देने वाले हमारे सूर्य में भी कई गतिविधियां होती रहती हैं। अक्‍सर हम ‘सोलर फ्लेयर', ‘कोरोनल मास इजेक्शन' और ‘सोलर विंड' जैसी घटनाओं के बारे में सुनते हैं और इनसे जुड़ी खबरें पढ़ते हैं। सूर्य में होने वाली इन एक्टिविटीज का असर कई बार पृथ्‍वी तक होता है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) के नजरिए से आज हम इन तीन गतिविधियों के बारे में जानेंगे, साथ ही यह भी समझेंगे कि इनमें आपस में क्‍या अंतर है।    कोरोनल मास इजेक्शन (CME) कोरोनल मास इजेक्शन या CME, सौर प्लाज्मा के बड़े बादल होते हैं। सौर विस्फोट के बाद ये बादल अंतरिक्ष में सूर्य के मैग्‍नेटिक फील्‍ड में फैल जाते हैं। अंतरिक्ष में घूमने की वजह से इनका विस्‍तार होता है और अक्‍सर यह कई लाख मील की दूरी तक पहुंच जाते हैं। कई बार तो यह ग्रहों के मैग्‍नेटिक फील्‍ड से टकरा जाते हैं। जब इनकी दिशा की पृथ्‍वी की ओर होती है, तो यह जियो मैग्‍नेटिक यानी भू-चुंबकीय गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं। इनकी वजह से सैटेलाइट्स में शॉर्ट सर्किट हो सकता है और पावर ग्रिड पर असर पड़ सकता है। इनका असर ज्‍यादा होने पर य...

पृथ्‍वी के पास से गुजर रहा बुर्ज खलीफा जितना बड़ा एस्‍टरॉयड, देखें वीडियो

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विज्ञान में दिलचस्‍पी रखने वालों के लिए एस्‍टरॉयड या क्षुद्रग्रह कौतूहल का विषय होते हैं। यह हर साल हमारी पृथ्‍वी के करीब से गुजरते हैं, जिनमें से कुछ को ‘खतरनाक' की श्रेणी में रखा जाता है। अंतरिक्ष में सफर कर रही ऐसी ही एक चट्टान जिसे एस्‍टरॉयड 7335 (1989 JA) के रूप में जाना जाता है, हमारी पृथ्‍वी के करीब से गुजर रही है। रिपोर्टों के अनुसार, यह इस साल का अबतक का सबसे बड़ा एस्‍टरॉयड है, जो पृथ्‍वी के पास से गुजर रहा है।  अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) की जेट प्रोपल्‍शन लेबोरेटरी ने भी इस एस्‍टरॉयड के पृथ्‍वी की ओर आने की जानकारी दी थी। बताया था कि 3,400 फीट चौड़ा एक विशाल एस्‍टरॉयड पृथ्‍वी की ओर बढ़ रहा है। कुछ दिनों पहले तक इसकी रफ्तार 47,196 किलोमीटर प्रति घंटा थी।  अगर आपकी दिलचस्‍पी इस फ्लाईबाई को देखने में है, तो इस यूट्यूब लिंक पर जाकर एक्‍सपीरियंस कर सकते हैं। भले ही इस एस्‍टरॉयड को पृथ्‍वी के लिए ‘संभाव‍ित रूप से खतरनाक' की कैटिगरी में रखा गया है, लेकिन यह पृथ्‍वी से काफी दूर होगा। यह दूरी, पृथ्‍वी और चंद्रमा की दूरी से भी 10 गुना ज्‍यादा है।     द वर्चुअल टेली...

उस ‘खजाने’ तक पहुंचे साइंटिस्‍ट जहां से निकलते हैं ब्‍लैक होल, सुलझेगा हमारी आकाशगंगा का रहस्‍य!

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ब्लैक होल (Black holes) के बारे में माना जाता है कि ये हमारी आकाशगंगा समेत ज्‍यादातर आकाशगंगाओं के केंद्र में मौजूद रहते हैं और उनके कामकाज में भूमिका निभाते हैं। अब रिसर्चर्स के एक ग्रुप ने बौनी (dwarf) आकाशगंगाओं में बड़े पैमाने पर ब्लैक होल छुपे होने का पता लगाया है। आमतौर पर ब्लैक होल का पता तब चलता है, जब वो अपने चारों ओर मौजूद गैस को खाकर बहुत तेजी से बढ़ते हैं और चमकने लगते हैं। रिसर्चर्स का मानना ​​है कि ये ब्लैक होल, आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद विशालकाय ब्लैक होल के बारे में अहम जानकारी दे सकते हैं।  यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना (UNC)-चैपल हिल डिपार्टमेंट ऑफ फिजिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी के खगोलविदों द्वारा की गई रिसर्च से हमारी आकाशगंगा के ब्लैक होल पर जानकारी मिलने की उम्‍मीद है।  माना जाता है कि हमारी ‘मिल्‍की वे' का निर्माण कई छोटी बौनी आकाशगंगाओं के विलय से हुआ है। लेकिन क्या सभी बौनी आकाशगंगाओं में एक बड़ा ब्लैक होल होता है, इसके बारे में अभी तक ज्‍यादा जानकारी नहीं थी, इसीलिए कई वैज्ञानिक यह जानने में जुटे हैं कि ब्‍लैक होल और आकाशगंगा एकसाथ कैसे डेवलप होते हैं।  ए...

उल्‍काओं में है दिलचस्‍पी तो 30-31 मई की रात आपको आसमान में देखना है, जानें क्‍या होगा

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आसमान में होने वाली घटनाओं में दिलचस्‍पी रखने वाले लोगों के लिए यह खबर अहम है। अगले हफ्ते की शुरुआत में दुनिया एक उल्‍का बौछार (meteor shower) को एक्‍सपीरियंस कर सकती है। ताऊ हरक्यूलिड्स नाम की इस उल्‍का बौछार के बारे में कहा जाता है कि यह इसी नाम के एक तारे से आती है, जिसका मुख्‍य धूमकेतु (comet) SW3 है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के अनुसार, 30 मई की रात और 31 मई की सुबह के समय में एक छोटी, लेकिन तेज उल्का बौछार आसमान में दिखाई दे सकती है।  नासा ने कहा है कि अगर ये उल्काएं पृथ्वी पर पहुंचती हैं, तो वो लगभग 16 किलोमीटर प्रति घंटे की धीमी रफ्तार से वायुमंडल में प्रवेश करेंगी। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के मुताबिक, दक्षिणी गोलार्ध की तुलना में उत्तरी गोलार्ध में इन उल्का बौछारों को देखना आसान होगा। हालांकि यह सब अभी अनुमान है। अगर धूमकेतु का मलबा उससे अलग हो जाता है, तभी दुनिया एक बेहतरीन उल्‍का बौछार का अनुभव कर पाएगी। बताया जाता है कि यह पिछले 20 साल की सबसे बेहतरीन उल्‍का बौछार हो सकती है या फ‍िर कुछ भी ना दिखाई दे।  SW3 धूमकेतु की खोज 1930 में हैम्बर्ग ऑब्‍जर्वेट्री के दो ज...

ऑस्‍ट्रेलियाई रिसर्चर्स का कमाल : रात में चार्ज कर दिए सोलर पैनल… नहीं होगी बिजली की किल्‍लत!

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जलवायु परिवर्तन की वजह से भविष्‍य में विनाशकारी असर देखने को मिल सकता है। इससे निपटने के लिए दुनियाभर में सौर ऊर्जा के इस्‍तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि इसमें एक चुनौती सामने आती है। यह चुनौती है सूर्य की रोशनी। दुनिया के कई इलाकों में सूर्य की रोशनी बहुत अच्‍छे से नहीं पहुंचती। साथ ही रात में सौर पैनल चार्ज नहीं होते। इन चुनौतियों को ऑस्‍ट्रेलियाई रिसर्चर्स के एक ग्रुप ने सॉल्‍व करने का दावा किया है। रिसर्चर्स ने रात में ऊर्जा पैदा करने के तरीके को सामने रखा है।   सौर ऊर्जा के बारे में यह तो सभी जानते हैं कि सौर पैनल सीधे सूर्य की रोशनी से ऊर्जा को अवशोषित करते हैं और इसे बिजली में बदल देते हैं। लेकिन रात में सौर ऊर्जा पैदा करना असंभव है। लेकिन ऑस्‍ट्रेलियाई रिसर्चर्स जो दावा कर रहे हैं, उसे इस क्षेत्र में एक बड़े कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।  न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी (UNSW सिडनी) की टीम ने रात में पृथ्वी द्वारा पैदा होने वाली गर्मी का इस्‍तेमाल किया है। दरअसल, सूर्य से आने वाली ऊर्जा पूरे दिन पृथ्वी को गर्म करती है और रात में हमारा ग्रह उतनी ही ऊर्जा अंतरिक्ष में ...

अमेरिका को चीन की चुनौती, लॉन्‍च करेगा 2.5 अरब पिक्‍सल कैमरे वाला स्‍पेस टेलीस्‍कोप, यह है तैयारी

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अमेरिका और यूरोपीय स्‍पेस एजेंस‍ियों को अंतरिक्ष में चीन से चुनौती मिल रही है। हाल में चीनी वैज्ञानिकों ने बड़ा दावा करते हुए कहा था कि चंद्रमा की मिट्टी में ऑक्सीजन और ईंधन को पैदा करने की क्षमता है। चीन के Chang'e 5 स्‍पेसक्राफ्ट द्वारा लाई गई चंद्रमा की मिट्टी का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे। चीन मंगल मिशन पर भी काम कर रहा है। यही नहीं, अब उसकी तैयारी साल 2023 तक अपना पहला बड़ा स्‍पेस टेलीस्‍कोप लॉन्‍च करने की है। इस टेलीस्‍कोप के जरिए चीन, अंतरिक्ष का सर्वेक्षण करना चाहता है। आकाशगंगाओं को एक्‍स्‍प्‍लोर करना चाहता है और तो और डार्क मैटर व डार्क एनर्जी के रहस्‍यों को उजागर करना चाहता है। चीन का यह टेलीस्‍कोप सीधे तौर पर अमेरिका और यूरोप के हबल टेलीस्‍कोप और हाल में लॉन्‍च किए गए जेम्‍स वेब टेलीस्‍कोप को टक्‍कर देगा।  space.com के मुताबिक, चीन की नेशनल एस्‍ट्रोनॉमिकल ऑब्‍जर्वेट्री के डेप्‍युटी डायरेक्‍टर लियू जिफेंग ने न्‍यूज एजेंसी सिन्हुआ को बताया है कि चीनी स्‍पेस स्‍टेशन टेलीस्कोप (CSST) एक ऑप्टिकल और अल्‍ट्रावॉयलेट स्‍पेस ऑब्‍जर्वेट्री है। इसमें ...

रॉकेट में आई ‘खराबी’, Jeff Bezos की कंपनी ब्लू ओरिजिन की 5वीं टूरिस्‍ट स्‍पेस फ्लाइट कैंसल

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अंतरिक्ष की उड़ान अब सिर्फ रिसर्च तक सीमित नहीं है। यह नई दुनिया का टूरिस्‍ट प्‍लेस बन रही है, जिसके जरिए लोग स्‍पेस का सफर कर रहे हैं। हालांकि अभी यह काफी महंगा टूरिज्‍म है। पिछले महीने हमने स्‍पेसएक्‍स के रॉकेट पर सवार होकर तीन यात्रियों को इंटरनेशनल स्‍पेस स्‍टेशन (ISS) की उड़ान भरते हुए और वहां से सफलतापूर्वक पृथ्‍वी पर लैंड करते हुए देखा था। Axiom Space ने इस मिशन को तैयार किया था और हरेक अंतरिक्ष यात्री को 420 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे। अरबपति जेफ बेजोस की कंपनी ब्लू ओरिजिन (Blue Origin) भी स्‍पेस फ्लाइट संचालित करती है। कल इसकी पांचवीं ह्यूमन स्‍पेस फ्लाइट प्रस्‍तावित थी, जिसमें अब देरी हो गई है।  जेफ बेजोस (Jeff Bezos) की कंपनी अपने न्यू शेपर्ड सबऑर्बिटल व्‍हीकल के अगले मिशन ‘NS-21' के लॉन्च का लक्ष्य बना रही थी। रिपोर्टों के अनुसार, अब इस प्‍लान को टाल दिया गया है। न्यू शेपर्ड सबऑर्बिटल व्‍हीकल एक रॉकेट है, जिसे ब्‍लू ओरिज‍िन ने बनाया है। न्यू शेपर्ड सबऑर्बिटल व्‍हीकल में एक रॉकेट और एक कैप्सूल होता है। इन दोनों को ही दोबारा इस्‍तेमाल किया जा सकता है।  ब्लू ओरिजिन...

हमारी आकाशगंगा में स्‍टार सिस्‍टम के विस्‍फोट से बन सकता है सुपरनोवा

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हमारा सौर मंडल एक सिंगल स्टार सिस्टम है। लेकिन यह हमारी आकाशगंगा के सभी स्‍टार सिस्‍टम्‍स के लिए जरूरी सच नहीं है। हमारी आकाशगंगा में कई मल्टी-स्टार सिस्टम हैं। इनमें से ज्‍यादातर बाइनरी सिस्टम हैं, जिनमें दो तारे शामिल हैं। कुछ सिस्‍टम ऐसे भी हैं, जिनमें दो से ज्‍यादा तारे हैं। जब बात तारों की आती है, तो जिक्र सुपरनोवा का भी होता है। सुपरनोवा किसी तारे की लास्‍ट स्‍टेज होती है, जिसके बाद वह उसमें विस्‍फोट हो जाता है। कुल मिलाकर कहें, तो जब किसी तारे में विस्‍फोट होता है, तो वह बहुत अधिक चमकदार हो जाता है। इसे सुपरनोवा कहते हैं। खगोलविद किसी भी संभावित सुपरनोवा विस्फोट पर नजर रखते हैं, क्योंकि इनका असर पूरे ब्रह्मांड पर पड़ता है। इसी कोशिश में रिसर्चर्स की एक टीम को एक चौगुने (quadruple) स्‍टार‍ सिस्‍टम के बारे में पता चला है, जिसे HD 74438 के रूप में जाना जाता है। यह एक नए चैनल को रिप्रजेंट कर सकता है, जिससे ब्रह्मांड में थर्मोन्यूक्लियर सुपरनोवा विस्फोट हो सकते हैं। HD 74438 स्‍टार सिस्टम की खोज साल 2017 में हुई थी। इसमें तारों की एक जोड़ी होती है, जो एक-दूसरे की परिक्रमा करती ह...

2 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर थे महासागर! वैज्ञानिकों ने ऐसे लगाया अनुमान

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पृथ्‍वी से बाहर जीवन की संभावना की बात आती है, तो इसका सबसे बड़ा दावेदार नजर आता है मंगल (Mars) ग्रह। वर्षों से वैज्ञानिक यह जानने में जुटे हैं कि क्‍या कभी मंगल ग्रह पर जीवन था। क्‍या भविष्‍य में ऐसी कोई उम्‍मीद है? तमाम अध्‍ययन संकेत तो देते हैं, लेकिन अभी बहुत शोध बाकी है। अब पेरिस यूनिवर्सिटी की एक स्‍टडी में पता चला है कि 2 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर तरल महासागर हो सकते थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि तरल महासागर संभव हो सकता है अगर तापमान जमाव बिंदु यानी 4.5 डिग्री सेल्सियस से ज्‍यादा होता है। मंगल ग्रह पर ऐसी स्थितियां आज से करीब 3 अरब साल पहले मुमकिन थीं।  हालांकि साल 2016 के एक रिव्‍यू कहा गया था कि लो सोलर रेडिएशन के कारण मंगल ग्रह की प्राचीन जलवायु बेहद ठंडी थी और एक महासागर को बरकरार नहीं रख सकती थी। वहीं, साल 2021 के एक अन्य अध्ययन में कहा गया है कि ग्रह का अपना वॉर्मिंग मैकेनिज्‍म है, जो झीलों और नदियों को पनपने दे सकता है।  मौजूदा अध्ययन में रिसर्चर्स ने पृथ्वी के जलवायु मॉडल पर बेस्‍ड त्रि-आयामी मॉडल का इस्‍तेमाल करके मंगल की प्राचीन जलवायु को दोबारा से तैयार किया। इस...

Nasa के पूर्व साइंटिस्‍ट का दावा- अगले कुछ साल में इंसान को मिल जाएंगे एलियंस

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क्‍या पृथ्‍वी के बाहर भी जीवन मौजूद है? यह सवाल वर्षों से हमारे सामने बना हुआ है। इसी के साथ एक और प्रश्‍न सामने आता है कि क्‍या एलियंस हैं? अगर हैं तो उनका अस्तित्‍व कहां है और कब से है? वैज्ञानिक इन सवालों के जवाब खोजने में जुटे हैं। हालांकि उनके सामने अबतक कोई पुख्‍ता तथ्‍य नहीं आ पाया है। दुनिया में यह मानने वालों की कमी नहीं है कि पृथ्‍वी के बाहर भी जीवन है और एलियंस का वजूद है। ऐसा मानने वालों में नासा के एक पूर्व प्रमुख वैज्ञानिक भी शामिल हैं। एक टीवी इंटरव्‍यू में बीते दिनों उन्‍होंने कहा कि अगले कुछ साल में इंसान की मुलाकात एलियंस से होगी।     बीबीसी से बातचीत में जिम ग्रीन ने समझाया कि पृथ्वी के बाहर भी जीवन मौजूद है, इस विश्वास को व्यक्त करने के बाद इंसान वास्तव में आश्चर्यजनक खोज के करीब है। करीब 40 साल तक अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी में काम कर चुके जिम ने कहा, उन्‍हें उम्‍मीद है कि उनके जीवनकाल में एलियंस की खोज हो जाएगी। जिम ने कहा कि हम बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। अब हम यह जानते हैं कि हमारी आकाशगंगा में जितने ग्रह हैं, उससे भी कहीं अधिक तारे हैं। उन्होंने कहा कि उनमे...

पृथ्‍वी की ओर बढ़ रहा खतरनाक सौर तूफान, Nasa ने दी यह चेतावनी

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अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) ने बताया है कि एक बड़ा सौर तूफान पृथ्‍वी की ओर बढ़ रहा है। नासा की सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेट्री (SDO) ने मंगलवार को सूर्य से निकल रही बेहद ताकतवर चमक को कैप्‍चर किया। नासा ने बताया है कि स्‍थानीय समय के मुताबिक, सुबह करीब 9:55 बजे सोलर फ्लेयर  अपने चरम पर था। इसे एक्‍स क्‍लास फ्लेयर के तौर पर क्‍लासिफाइड किया गया है, जिसका मतलब है कि यह असरदार हो सकता है। नासा ने जो इमेज शेयर की है, वह सूर्य से बहुत तेजी से निकल रही अल्‍ट्रावॉयलेट (UV) लाइट्स के बारे में बताती है।  सोलर फ्लेयर्स वह घटना है, जब सूर्य से निकलने वाले रेडिएशन में शक्तिशाली विस्फोट होते हैं। ये विस्‍फोट कुछ मिनटों से लेकर घंटों तक चल सकते हैं। इससे निकलने वाला हानिकारक रेडिएशन पृथ्वी के वायुमंडल तक पहुंच सकता है। हालांकि यह इंसानों को शारीरिक रूप से प्रभावित नहीं करता, पर रेडियो कम्‍युनिकेशन, इलेक्ट्रिक पावर ग्रिड, नेविगेशन सिग्‍नल्‍स को प्रभावित कर सकता है। यह स्‍पेस क्राफ्ट और अंतरिक्ष यात्रियों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।  नासा की सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी साल 2010 से सूर्य को ...

NASA का स्पेसक्राफ्ट जाएगा Apophis पर, पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा खतरा है यह एस्ट्रॉयड

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NASA की जेट प्रोपल्शन लैब (JPL) ने कथित तौर पर 2004 MN4 (वर्तमान में Apophis) नाम के एक एस्ट्रॉयड के पृथ्वी से 2029 में टकराने की संभावना जताई थी, जिसके बाद अब अमेरिकी स्पेस एजेंसी इस एस्ट्रॉयड पर अपना स्पेसक्राफ्ट भेजने की तैयारी कर रही है। 2004 में, इस एस्ट्रॉडय को सबसे पहले एस्ट्रोनोमर फैब्रिज़िओ बर्नार्ड (Fabrizio Bernard) ने अपने दो साथियों के साथ देखा था। इसके बाद से इस एस्ट्रॉयड के ऊपर कई तरह के विश्लेषण हुए। एपोफिस की कक्षा को जांचने के पता चला कि इसके अगली शताब्दी तक पृथ्वी से टकराने की संभावना नहीं है, लेकिन फिर भी 2029 में यह हमारे ग्रह के बेहद करीब पहुंच जाएगा, और उस समय इसकी दूरी सिर्फ 32,000 किलोमीटर होगी। Scientific American की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि NASA वैज्ञानिकों ने उत्सुकता से 2029 में इसके आसपास से गुज़रने के समय पर इस एस्ट्रॉयड पर अपना स्पेसक्राफ्ट भेजने का प्रस्ताव दिया है। NASA इसके लिए पहले से अंतरिक्ष में अपनी यात्रा कर रहा OSIRIS-REx यान तय किया गया है। बता दें, यह यान शुरू में 2016 में Bennu नाम के एक अन्य एस्ट्रॉयड से सैंपल एकत्र करने के मिशन ...

पृथ्‍वी से 3000 प्रकाश वर्ष दूर मिला ‘ब्लैक विडो’ स्‍टार, जानें इसके बारे में

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हमारा ब्रह्मांड रहस्यों से भरा है, जहां लाखों ऑब्‍जेक्‍ट्स घूम रहे हैं। हमारी आकाशगंगा में ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जो छुपी हुई हैं। हम उनमें से बहुत कम के बारे में जानते हैं। हालांकि वो हमारे जीवन को किसी ना किसी रूप में प्रभावित करती हैं। इन पर स्‍टडी करने की कोशिशें होती रही हैं। ऐसे ही एक ऑब्‍जेक्‍ट का पता खगोलविदों ने लगाया है, जो पृथ्‍वी से लगभग 3,000 से 4,000 प्रकाश वर्ष दूर है। इससे रहस्यमयी रोशनी निकलती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चीज एक ‘ब्लैक विडो' स्‍टार हो सकती है, जो तेजी से घूमने वाला पल्सर या न्यूट्रॉन तारा हो सकता है। यह ऐसा तारा होता है, जो अपने छोटे और सहयोगी तारे को धीरे-धीरे खाकर पनपता है। ब्लैक विडो स्टार काफी दुर्लभ हैं। खगोलविद मिल्की वे यानी हमारी आकाशगंगा में ऐसे सिर्फ दो दर्जन स्‍टार का ही पता लगा पाए हैं। मैसाचुसेट्स इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी (MIT) के रिसर्चर्स ने इस नए ब्‍लैक विडो स्‍टार का पता लगाया है। उनका मानना ​​है कि यह उन सभी ब्‍लैक विडो स्‍टार में सबसे अजीब और अनोखा ब्लैक विडो पल्सर हो सकता है। इसका नाम ZTF J1406+1222 रखा गया है। रिसर्...

शरीर के अंदर तंग जगहों पर जानें के लिए तैरने का तरीका बदल देते हैं बैक्टीरिया

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एक नई स्टडी से पता चला है कि बैक्टीरिया तंग जगहों से गुजरते हुए अपने तैरने के पैटर्न को बदलते हैं। अमेरिका में हवाई यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स का कहना है कि बैक्टीरिया के व्यवहार में अचानक आया बदलाव हैरान करने वाला है। उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया ने एक लाइन बनाई, और खुली जगहों के विपरीत कैद से बचने के लिए एक सीधी लाइन में तैरना शुरू कर दिया। खुली जगहों में, ये बैक्टीरिया बिना किसी खास पैटर्न के अपने मनमाने ढंग से घूमते हुए दिखाई दिए। बैक्टीरिया लगभग सभी जीवों के शरीर पर या उनके भीतर सहजीवी के रूप में रहते हैं। रिसर्चर्स को उम्मीद है कि उनकी स्टडी यह समझने में मदद कर सकती है कि इंसानी माइक्रोबायोम में बैक्टीरिया कैसे रहते हैं। माइक्रोब्स (सूक्ष्मजीव) अक्सर जटिल रास्ते अपनाते हैं, यहां तक ​​कि शरीर के टिशू के बेहद छोटे छेदों के जरिए भी निकल जाते हैं। यह स्टडी दिखाती है कि तंग जगह बैक्टीरिया के लिए एक संकेत के रूप में काम कर सकते हैं कि जटिल वातावरण से कैसे नेविगेट किया जाए।   इस स्टडी के लिए रिसर्चर्स ने विब्रियो फिशरी (Vibrio fischeri) का इस्तेमाल किया। यह एक रॉड की शेप का जीवाणु होत...

इंटरनेशनल स्‍पेस स्‍टेशन के लिए उड़े Nasa के 4 एस्‍ट्रोनॉट, बिना मिट्टी के उग रहे पौधों पर करेंगे रिसर्च

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स्‍पेसएक्‍स (SpaceX) के जिस लॉन्‍च की बात हमने आज बताई थी, वह हो गया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) के लिए चार एस्‍ट्रोनॉट्स को लेकर स्‍पेसएक्‍स का फॉल्‍कन 9 रॉकेट दोहपर करीब डेढ़ बजे उड़ा। कैनेडी स्‍पेस सेंटर से लॉन्‍च हुए इस मिशन में अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री केजेल लिंडग्रेन, बॉब हाइन्स और जेसिका वॉटकिंस के साथ यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के इतालवी मेंबर सामंथा क्रिस्टोफोरेटी भी शामिल थे। ये सभी अगले 6 महीने के लिए मिशन पर निकले हैं और 17 घंटे का सफर करके इंटरनेशनल स्‍पेस स्‍टेशन (ISS) पर पहुंचेंगे। लॉन्‍च को नासा की वेबसाइट और सोशल मीडिया पर लाइव स्‍ट्रीम किया गया।  एक न्‍यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अरबपति एलन मस्‍क की कंपनी स्‍पेसएक्‍स ने 40 घंटे के अंतराल में एक मिशन को ISS से पृथ्‍वी पर लैंड कराकर दूसरे मिशन के लिए उड़ान भरी है। यह नासा के लिए अंतरिक्ष के सफर पर जाने वाली प्रमुख ‘टैक्‍सी' बन गई है, जिसकी सेवाएं 2020 से ली जा रही हैं।   इससे पहले अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी रूस के रॉकेट सोयुज पर निर्भर थी, जिसकी जगह अब स्‍पेसएक्‍स के फॉल्‍कन 9 रॉकेट ने ले ली है। क्रू-...