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इंसान अपने शरीर के इस अंग से भी ले सकते हैं सांस, जानकर रह जाएंगे दंग

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वैज्ञानिकों द्वारा तरह-तरह की स्टडी की जाती है, जिसमें कई ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो आपको चौंका सकते हैं। एक लेटेस्ट स्टडी में भी ऐसी जानकारी निकलकर सामने आई है, जिसे जानकर आप दंग रह जाएंगे, या यूं कहो की आप उसे मानने के लिए शायद राजी भी न हो। वैज्ञानिकों की एक टीम ने पता लगाया है कि गुदा से सांस लेना संभव है। जी हां, आपने सही पढ़ा, इस स्टडी में दावा किया गया है कि यह खोज भविष्य में इंसानों की भी जान बचाने के काम आएगी। Science Direct ने MED में पब्लिश एक रिसर्च का हवाला देते हुए बताया कि गुदा से सांस लेना भी संभव है। वैज्ञानिकों के एक समूह ने कछुओं के धीमे मेटाबॉलिज्म के आधार पर सूअरों और चूहों पर कई प्रयोग किए। इसमें म्यूकोसल लाइनिंग को पतला करने के लिए जानवरों की आंतों को साफ किया गया, जिससे खून के प्रवाह में बाधा को कम किया जा सके। इसके बाद उन जानवरों को एक ऐसे कमरे में रखा गया जहां ऑक्सीजन नहीं थी। ऐसा माना जाता है कि क्योंकि कछुओं के पास इस तरह की परत होती है, वे अपने गुदा के जरिए सांस लेने में सक्षम होते हैं, जिसकी वजह से वो सर्दियों में जीवित रहने में सक्षम होते हैं। रिपोर्ट...

नई खोज : 43 करोड़ साल से लग रही जंगलों में आग, वैज्ञानिकों ने खोज निकाली वह जगह

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जंगलों में लगने वाली आग ने हाल के वर्षों में जानवरों और स्थानीय लोगों के लिए खतरा पैदा किया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जंगलों में आग करोड़ों वर्षों से लगती रही है। वैज्ञानिकों ने दुनिया के सबसी पुरानी जंगल की आग की खोज की है। वेल्स (Wales) और पोलैंड (Poland) में पाए गए 43 करोड़ वर्ष पुराने चारकोल की मदद से इसका पता चला है। यानी 43 करोड़ साल पहले जंगलों में आग लगती थी। इससे पता चलता है कि सिलुरियन (Silurian period) काल के दौरान पृथ्वी पर जीवन कैसा था। उस समय पौधे का जीवन दोबारा जीवन के लिए काफी हद तक पानी पर निर्भर होता था। सूखे इलाकों में पौधों के पनपने की संभावना नहीं होती थी। तब जंगलों में आग ज्‍यादातर बार छोटी वनस्‍पति के जरिए ही लगती थी।  रिसर्चर्स के अनुसार, प्राचीन फंगस ‘प्रोटोटैक्साइट्स' (Prototaxites) पेड़ों के बजाए पर्यावरण पर हावी रहे होंगे। इनके सटीक आकार का तो पता नहीं, पर कहा जाता है कि यह लगभग 30 फीट की ऊंचाई तक रहे होंगे।  रिपोर्ट के अनुसार, जंगल की आग को लंबे समय तक टिके रहने के लिए ईंधन की जरूरत होती होगी। यह काम पौधे करते होंगे। इसके अलावा, आग लगने के लिए ब...

Research shows development of hybrid sensor to help diagnose cancer

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MOSCOW: A research team from HSE University, Skoltech , MPGU and MISIS has developed a nanophotonic-microfluidic sensor whose potential applications include detection, monitoring and assessment of treatment success. Today, the device can identify dissolved gases and liquids in low concentrations with high accuracy. The study appeared in Optics Letters . According to the World Health Organisation, in 2020 the global cancer burden was estimated at 19.3 million new cases and 10 million deaths. WHO experts believe that an estimated 30% of new cases could be prevented, and about the same proportion could be cured, with early detection. Today, a 'lab-on-a-chip' is a miniature sensor device capable of performing complex biochemical analysis which is considered one of the most promising approaches to early cancer detection. Russian researchers have developed a new hybrid nanophotonic-microfluidic sensor for highly sensitive analysis of liquids and gases at very low concentrations ...

राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान (National Tribal Research Institute) का उद्घाटन किया गया

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First Published: June 9, 2022 | Last Updated:June 9, 2022 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 7 जून, 2022 को दिल्ली में राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान का उद्घाटन किया। मुख्य बिंदु जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा “आजादी का अमृत महोत्सव” के एक भाग के रूप में राष्ट्रीय आदिवासी अनुसंधान संस्थान का उद्घाटन किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान, जनजातीय मामलों के मंत्रालय की उपलब्धियों को प्रदर्शित करने वाली एक प्रदर्शनी भी प्रदर्शित की गई। राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान राष्ट्रीय स्तर का एक प्रमुख संस्थान होगा। यह शैक्षणिक, विधायी और कार्यकारी क्षेत्रों में जनजातीय चिंताओं, मामलों और मुद्दों का एक प्रमुख केंद्र बन जाएगा। राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान के कार्य यह प्रतिष्ठित अनुसंधान संस्थानों, संगठनों, विश्वविद्यालयों, संसाधन केंद्रों और शैक्षणिक निकायों के साथ नेटवर्क और सहयोग करेगा। संस्थान जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs), NFS के अनुसंधान विद्वानों और उत्कृष्टता केंद्रों (CoEs) की परियोजनाओं की निगरानी...

उस ‘खजाने’ तक पहुंचे साइंटिस्‍ट जहां से निकलते हैं ब्‍लैक होल, सुलझेगा हमारी आकाशगंगा का रहस्‍य!

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ब्लैक होल (Black holes) के बारे में माना जाता है कि ये हमारी आकाशगंगा समेत ज्‍यादातर आकाशगंगाओं के केंद्र में मौजूद रहते हैं और उनके कामकाज में भूमिका निभाते हैं। अब रिसर्चर्स के एक ग्रुप ने बौनी (dwarf) आकाशगंगाओं में बड़े पैमाने पर ब्लैक होल छुपे होने का पता लगाया है। आमतौर पर ब्लैक होल का पता तब चलता है, जब वो अपने चारों ओर मौजूद गैस को खाकर बहुत तेजी से बढ़ते हैं और चमकने लगते हैं। रिसर्चर्स का मानना ​​है कि ये ब्लैक होल, आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद विशालकाय ब्लैक होल के बारे में अहम जानकारी दे सकते हैं।  यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना (UNC)-चैपल हिल डिपार्टमेंट ऑफ फिजिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी के खगोलविदों द्वारा की गई रिसर्च से हमारी आकाशगंगा के ब्लैक होल पर जानकारी मिलने की उम्‍मीद है।  माना जाता है कि हमारी ‘मिल्‍की वे' का निर्माण कई छोटी बौनी आकाशगंगाओं के विलय से हुआ है। लेकिन क्या सभी बौनी आकाशगंगाओं में एक बड़ा ब्लैक होल होता है, इसके बारे में अभी तक ज्‍यादा जानकारी नहीं थी, इसीलिए कई वैज्ञानिक यह जानने में जुटे हैं कि ब्‍लैक होल और आकाशगंगा एकसाथ कैसे डेवलप होते हैं।  ए...

ऑस्‍ट्रेलियाई रिसर्चर्स का कमाल : रात में चार्ज कर दिए सोलर पैनल… नहीं होगी बिजली की किल्‍लत!

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जलवायु परिवर्तन की वजह से भविष्‍य में विनाशकारी असर देखने को मिल सकता है। इससे निपटने के लिए दुनियाभर में सौर ऊर्जा के इस्‍तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि इसमें एक चुनौती सामने आती है। यह चुनौती है सूर्य की रोशनी। दुनिया के कई इलाकों में सूर्य की रोशनी बहुत अच्‍छे से नहीं पहुंचती। साथ ही रात में सौर पैनल चार्ज नहीं होते। इन चुनौतियों को ऑस्‍ट्रेलियाई रिसर्चर्स के एक ग्रुप ने सॉल्‍व करने का दावा किया है। रिसर्चर्स ने रात में ऊर्जा पैदा करने के तरीके को सामने रखा है।   सौर ऊर्जा के बारे में यह तो सभी जानते हैं कि सौर पैनल सीधे सूर्य की रोशनी से ऊर्जा को अवशोषित करते हैं और इसे बिजली में बदल देते हैं। लेकिन रात में सौर ऊर्जा पैदा करना असंभव है। लेकिन ऑस्‍ट्रेलियाई रिसर्चर्स जो दावा कर रहे हैं, उसे इस क्षेत्र में एक बड़े कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।  न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी (UNSW सिडनी) की टीम ने रात में पृथ्वी द्वारा पैदा होने वाली गर्मी का इस्‍तेमाल किया है। दरअसल, सूर्य से आने वाली ऊर्जा पूरे दिन पृथ्वी को गर्म करती है और रात में हमारा ग्रह उतनी ही ऊर्जा अंतरिक्ष में ...

स्‍टडी में दावा- टोंगा के समुद्र में फटा ज्‍वालामुखी था 140 साल का सबसे बड़ा विस्‍फोट

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दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित देश टोंगा (Tonga) में इस साल की शुरुआत में एक ज्‍वालामुखी (volcano) फट गया था। यह ज्‍वालामुखी समुद्र के नीचे फटा था, जिसने बड़े स्‍तर पर दबाव वाली लहरें या शॉक वेव्‍स पैदा कीं, जिनमें से कुछ पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरीं। इन शॉक वेव्‍स की वजह से 10 हजार किलोमीटर दूर अमेरिका के राज्य अलास्का में भी लोगों ने पानी में शोर और उछाल आने की जानकारी दी। अब दो नई स्‍टडीज से पता चला है कि यह पिछले 140 साल में सबसे बड़ा विस्फोट है। टोंगा की घटना की तुलना 1883 में इंडोनेशिया में हुए क्राकाटाऊ विस्फोट से की गई है। उस उस भयावह घटना में 30 हजार से ज्‍यादा लोग मारे गए थे। बताया जाता है कि सीमाउंट में कई हफ्तों की एक्टिविटीज के बाद यह विस्‍फोट हुआ। न्‍यूक्‍लियर टेस्‍ट बैन ट्रीटी (CTBT) का पालन करने के लिए लगाए गए डिटेक्‍टरों ने इस विस्‍फोट से हुए सिग्‍नलों को नोट‍िस किया। बताया जाता है कि इससे जो ऊर्जा निकली थी, वह 100 हिरोशिमा बमों के स्केल के बराबर थी।   टोंगा में जब पानी के नीचे ज्वालामुखी फटा, तो उसने हमारे वायुमंडल की तीसरी लेयर मेसोस्फीयर से टकराने के लिए...

मिस्र के रेगिस्‍तान में मिला ‘परग्रही’ पत्‍थर हाइपेटिया सुलझाएगा सुपरनोवा का रहस्‍य!

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जब किसी तारे में विस्‍फोट होता है, तो वह बहुत अधिक चमकदार हो जाता है। इसे सुपरनोवा (supernova) कहते हैं। यह अंतरिक्ष में किसी तारे में होने वाले रहस्यमयी और चमकदार विस्फोटों में से एक है। हकीकत में सुपरनोवा इतने बड़े विस्‍फोट हैं, जिन्‍हें इंसानों ने देखा है। यह इतने बड़े एरिया को कवर करते हैं कि विस्‍फोट देखने के लिए दूरबीन की जरूरत होती है। सुपरनोवा आमतौर पर तब होता है, जब कोई विशालकाय तारा अपने विकास के आखिरी चरणों में पहुंचता है यानी वह बूढ़ा हो जाता है। इन घटनाओं को समझने के लिए कई स्‍टडी की जा रही हैं। रिसर्चर्स को उम्मीद है कि मिस्र के रेगिस्तान में मिला एक ‘परग्रही' पत्थर इन शानदार घटनाओं पर कुछ रोशनी डालने में मदद कर सकता है। इस पत्थर का नाम हाइपेटिया (Hypatia) है। दक्षिण अफ्रीका की जोहान्सबर्ग यूनिवर्सिटी समेत अन्‍य रिसर्चर्स का मानना ​​है कि यह पत्थर टाइप IA सुपरनोवा का पहला ठोस सबूत है। साल 2013 के बाद से कुछ वैज्ञानिकों ने हाइपेटिया के छोटे से टुकड़े में बेहद असामान्य कैमिस्‍ट्री के सुराग खोजे हैं। एक्‍सपर्ट की कल्‍पना है कि हाइपेटिया पत्थर की उत्पत्ति एक तारे से ...

2 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर थे महासागर! वैज्ञानिकों ने ऐसे लगाया अनुमान

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पृथ्‍वी से बाहर जीवन की संभावना की बात आती है, तो इसका सबसे बड़ा दावेदार नजर आता है मंगल (Mars) ग्रह। वर्षों से वैज्ञानिक यह जानने में जुटे हैं कि क्‍या कभी मंगल ग्रह पर जीवन था। क्‍या भविष्‍य में ऐसी कोई उम्‍मीद है? तमाम अध्‍ययन संकेत तो देते हैं, लेकिन अभी बहुत शोध बाकी है। अब पेरिस यूनिवर्सिटी की एक स्‍टडी में पता चला है कि 2 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर तरल महासागर हो सकते थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि तरल महासागर संभव हो सकता है अगर तापमान जमाव बिंदु यानी 4.5 डिग्री सेल्सियस से ज्‍यादा होता है। मंगल ग्रह पर ऐसी स्थितियां आज से करीब 3 अरब साल पहले मुमकिन थीं।  हालांकि साल 2016 के एक रिव्‍यू कहा गया था कि लो सोलर रेडिएशन के कारण मंगल ग्रह की प्राचीन जलवायु बेहद ठंडी थी और एक महासागर को बरकरार नहीं रख सकती थी। वहीं, साल 2021 के एक अन्य अध्ययन में कहा गया है कि ग्रह का अपना वॉर्मिंग मैकेनिज्‍म है, जो झीलों और नदियों को पनपने दे सकता है।  मौजूदा अध्ययन में रिसर्चर्स ने पृथ्वी के जलवायु मॉडल पर बेस्‍ड त्रि-आयामी मॉडल का इस्‍तेमाल करके मंगल की प्राचीन जलवायु को दोबारा से तैयार किया। इस...

वैज्ञानिकों ने खोजी नई तरकीब, ब्‍लैक होल की जोड़ी को समझना होगा और आसान

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तीन साल पहले एक ब्‍लैक होल की तस्‍वीर ने दुनिया को हैरान कर दिया था। इवेंट होराइजन टेलीस्कोप ने मेसियर 87 आकाशगंगा के केंद्र में स्थित उस ब्‍लैक होल की इमेज को कैप्‍चर किया था। इस तस्‍वीर में ब्‍लैक होल का वह जोड़ा किसी जलती हुई रिंग की तरह दिखाई दे रहा था, जिसके बीच में गहरा काला गड्ढा था। अब कोलंबिया यूनिवर्सिटी के दो रिसर्चर्स ने ऐसे ब्‍लैक होल के बारे में और समझने के लिए एक तरकीब का आविष्कार किया है। इसकी मदद से आने वाले समय में खगोलविद मेसियर 87 जैसे छोटे ब्लैक होल का अध्ययन करने में सक्षम हो सकते हैं। इस अप्रोच के सिर्फ दो क्राइटेरिया हैं। इस आविष्‍कार को शुरू करने के लिए विशायलकाय ब्लैक होल की एक जोड़ी होनी चाहिए। यह जोड़ी एक दूसरे के साइड में होनी चाहिए। उस पॉइंट पर जब एक ब्लैक होल दूसरे के सामने से गुजरता है, तब व्यक्ति को प्रकाश की तेज चमक देखने में काबिल होना चाहिए। यह स्‍टडी फिजिकल रिव्यू डी जर्नल में प्रकाशित हुई है। कोलंबिया में पोस्ट-डॉक्टरेट फेलो और कम्प्यूटेशनल एस्ट्रोफिजिक्स के फ्लैटिरॉन इंस्टीट्यूट के सेंटर और इस स्‍टडी के पहले लेखक ने कहा कि M87 ब्लैक होल की हा...

स्‍पेस में रहने से बड़ा हो जाता है अंतरिक्ष यात्रियों का दिमाग, जानें क्‍यों होता है ऐसा

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अंतरिक्ष की यात्रा पर जाना जितना रोमाचंक लगता है, यह उतना ही मुश्किलों से भरा है। अंतरिक्ष में रहने के दौरान यात्रियों को कई बदलावों से गुजरना पड़ता है, जिसका असर उनके मस्तिष्‍क पर दिखाई देता है। रिसर्चर्स ने इंटरनेशनल स्‍पेस स्‍टेशन (ISS) पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग में बदलाव का पता लगाया है। रिसर्चर्स ने 15 अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग पर शोध किया। उन्‍हें पता चला कि मस्तिष्क में रक्त वाहिकाओं के आसपास की जगह, जो द्रव यानी फ्लूइड से भरी होती है, उसमें बदलाव आ गया।  यह रिसर्च ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल' में प्रकाशित हुई है। इसमें बताया गया है कि रिसर्चर्स ने मैग्‍नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (MRI) का इस्‍तेमाल करके अंतरिक्ष में जाने वाले से पहले यात्रियों के दिमाग को देखा। जब अंतरिक्ष यात्री इंटरनेशनल स्‍पेस स्‍टेशन पर पहुंच गए, उसके बाद भी रिसर्चर्स ने एक-एक महीने के अंतराल पर उनके दिमाग को देखा। 6 महीने बाद जब अंतरिक्ष यात्री पृथ्‍वी पर लौटे, तो उनकी बारीकी से जांच की गई।  रिसर्चर्स ने पाया कि अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग में द्रव से भरी वह जगह जिसे पेरिवास्कुलर स्पेस ...

वैज्ञानिकों का दावा- चंद्रमा की मिट्टी से पैदा हो सकती है ऑक्‍सीजन

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दुनिया भर के वैज्ञानिक चंद्रमा पर इंसान की स्‍थायी मौजूदगी बनाए रखने के तरीके खोज रहे हैं। इसके लिए चंद्रमा को एक्‍सप्‍लोर किया जा रहा है। इस बीच, चीन के रिसर्चर्स ने दावा किया है कि चंद्रमा की मिट्टी में ऑक्सीजन और ईंधन पैदा करने की क्षमता है। उनका कहना है कि चंद्रमा पर मिट्टी में एक्टिव कंपाउंड्स होते हैं। ये कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन और ईंधन में बदल सकते हैं। इन निष्कर्षों से पता चलता है कि चंद्रमा का सतह पर मौजूद मिट्टी का इस्‍तेमाल हाइड्रोजन और मीथेन को हासिल करने के लिए किया जा सकता है। इनकी मदद से इंसान की अहम जरूरतें पूरी हो सकती हैं और वह चंद्रमा पर रह सकता है। रिसर्चर्स का कहना है कि वो चंद्रमा में सांस लेने लायक वातावरण भी पैदा कर सकते हैं।  आने वाले वर्षों में चंद्रमा पर कई देशों के मिशनों के लैंड होने की उम्‍मीद है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) भी अपने आर्टेमिस मिशन के तहत दोबारा से अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर भेजने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का मकसद चंद्रमा को मंगल समेत अंतरिक्ष में इंसान को आगे भेजने के लिए एक गेटवे के रूप में उपयोग करना...

रिसर्च में चला पता, शनि ग्रह के कई ऑरोरा को बनाती हैं इसकी हवाएं

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ऑरोरा (aurora) आकाश में बनने वाली खूबसूरत प्राकृतिक रोशनी है। यह रात के वक्‍त आमतौर पर नॉर्थ और साउथ पोल्‍स के पास देखने को मिलती है। लंबे समय से वैज्ञानिक यह मानते आए हैं कि ऑरोरा तब बनते हैं, जब सौर हवाएं पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से इंटरेक्‍ट करती हैं। ऐसा दूसरे ग्रहों पर भी होता है, लेकिन लीसेस्टर यूनिवर्सिटी (University of Leicester) के वैज्ञानिकों का दावा है कि सभी अरोरा इस घटना से नहीं बने हैं। वैज्ञानिकों को शनि ग्रह (Saturn) के नॉर्थ पोल पर ग्रहीय अरोरा बनाने वाला मैकेनिज्‍म मिला है। इसे पहले कभी देखा नहीं गया है।  तो क्‍या है वह मैकेनिज्‍म? वैज्ञानिकों का कहना है कि शनि ग्रह के कुछ ऑरोरा इस ग्रह के अपने वातावरण के अंदर घूमने वाली हवाओं से पैदा होते हैं। इस खोज ने ग्रहों के ऑरोरा को लेकर बनाए गई समझ को बदल दिया है। यह शनि के बारे में एक रहस्य को भी सुलझाता है कि हम ग्रह पर दिन की लंबाई क्‍यों नहीं माप सकते?  नासा (NASA) ने साल 1997 में कैसिनी (Cassini) को लॉन्‍च किया था, जो साल 2004 में शनि तक पहुंच गया। तब से इसने यह मापने की कोशिश की है कि यह ग्रह अपने दिन की लेंथ तय कर...

वैज्ञानिकों ने खोजे अनोखे जुड़वां एस्‍टरॉयड, उम्र में हो सकते हैं सबसे छोटे

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एक अजीबोगरीब खोज के तहत वैज्ञानिकों को जुड़वां एस्‍टरॉयड (asteroid) मिले हैं। ये पृथ्वी के सबसे नए पड़ोसी हो सकते हैं। अनुमान है कि लगभग 6 लाख मील की दूरी पर ये एस्‍टरॉयड कुछ सदियों पहले अपने पैरंट एस्‍टरॉयड से अलग हुए। अगस्‍त 2019 में इन एस्‍टरॉयड को अलग-अलग संस्थाओं (entities) के रूप में खोजा गया था। हालांकि उसके बाद शोधकर्ताओं ने इनके परिक्रमा पैटर्न में समानता को देखा। एस्‍टरॉयड 2019 PR2 और 2019 QR6 ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया जब वैज्ञानिकों ने इनके इतिहास को टटोला। साल 2005 से स्‍टोर ‘कैटालिना स्काई सर्वे डेटा' को देखते हुए वैज्ञानिकों को इन एस्‍टरॉयड के बारे में एक दिलचस्प संभावना दिखाई दी। एडिशनल ऑब्‍जर्वेशन ने वैज्ञानिकों को इन एस्‍टरॉयड की पुरानी लोकेशन में जाने में मदद की। इसके बाद ऑर्बिटल कैलकुलेशन से यह निर्धारित किया गया कि अतीत में दो एस्‍टरॉयड सिर्फ एक इकाई थे। वैज्ञानिकों ने दो मॉडल का इस्तेमाल किया जिसके अनुसार, पैरंट एस्‍टरॉयड 230 और 420 साल पहले या 265 और 280 साल पहले टूट गया होगा। इसी वजह से ये दो एस्‍टरॉयड बन गए।  यह रिसर्च पेपर 2 फरवरी को रॉयल एस्ट्रो...

‘NIPER Research Portal’ लांच किया गया

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First Published: January 31, 2022 | Last Updated:January 31, 2022 NIPER का अर्थ National Institute of Pharmaceutical Education and Research है। रसायन मंत्रालय ने हाल ही में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में नवाचार और अनुसंधान की सुविधा के लिए NIPER पोर्टल लॉन्च किया है। मुख्य बिंदु  NIPER अनुसंधान पोर्टल, NIPER की अनुसंधान गतिविधियों के बारे में जानकारी प्रदान करेगा। यह पोर्टल NIPER के पेटेंट और प्रकाशन की जानकारी को भी सूचीबद्ध करेगा। यह एक ही स्थान पर सभी NIPER के अनुसंधान विवरण रखेगा। इससे सूचना तक पहुंच आसान हो जाती है। महत्व यह पोर्टल उपयुक्त संगठनों से संपर्क करने में शोधकर्ताओं की सहायता करेगा। यह शोधकर्ताओं को सही संस्थान के साथ सहयोग करने और अपनी शोध गतिविधि को और अधिक सार्थक बनाने की अनुमति देगा। यह पोर्टल दवा उद्योगों के विकास में मदद करेगा। यह उद्योग-अकादमिक सहयोग में मदद करेगा। मानव संसाधन और युवा प्रतिभा को दिशा देने के लिए यह सहयोग आवश्यक है। साथ ही, इस पोर्टल से MSMEs को काफी हद तक फायदा होगा। NIPER NIPER राष्ट्रीय स्तर के फार्मास्युटिकल...

पहली बार चंद्रमा पर जाकर खोजा पानी, चीन के Chang'e 5 लुनर लैंडर की कामयाबी

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चंद्रमा पर गए चीन के Chang'e 5 लुनर लैंडर ने वहां पानी से जुड़े अहम सबूत की खोज की है। इस लैंडर ने चंद्रमा की सतह पर पानी से जुड़ा पहला ऑन-साइट सबूत पाया है। यह बताता है कि आखिर पानी की मौजूदगी के बाद भी चंद्रमा सूखा क्‍यों है। पीयर-रिव्यू जर्नल साइंस एडवांस में शनिवार को पब्‍लिश हुई स्‍टडी से पता चला है कि चंद्रमा की लैंडिंग साइट पर मौजूद मिट्टी में 120 भाग-प्रति-मिलियन (ppm) पानी है। यानी एक टन मिट्टी में 120 ग्राम पानी है। हल्की और वेसिकुलर चट्टान में यहां पानी की मात्रा 180ppm है। यह पृथ्‍वी की तुलना में बहुत कम है। इस वजह से चंद्रमा अधिक शुष्क है। इससे पहले रिमोट ऑब्जर्वेशन के जरिए चंद्रमा में पानी की मौजूदगी की पुष्टि हो गई थी, लेकिन अब जाकर लैंडर ने वहां की चट्टानों और मिट्टी में पानी के लक्षण पाए हैं। लुनर लैंडर पर सवार एक डिवाइस ने रेजोलिथ (regolith) और चट्टान के स्पेक्ट्रल परावर्तन को मापा और पहली बार मौके पर पानी की मौजूदगी का पता लगाया।  चाइनीज अकैडमी ऑफ साइंसेज (CAS) के रिसर्चर्स के हवाले से समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने बताया है कि पानी की मात्रा का अनुमान लगाया जा सक...

ऐसी होंगी Future cars, बिना हेडफोन सुन सकेंगे सॉन्‍ग, सामने वाले को नहीं आएगी आवाज

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रोड ट्र‍िप्‍स तब मुश्किलों से भर जाती हैं, जब उनमें किसी और की पसंद का म्‍यूजिक सुनना पड़ता है। जैसे- आपको पसंद हैं नाइंटीज के मेलॉडी सॉन्‍ग और सामने वाला दमदार बैस वाले पंजाबी गाने बजा दे। हेडफोन इसका एक सॉल्‍यूशन जरूर हैं, लेकिन लंबी रोड ट्रिप्‍स में उनके साथ बैठे रहना कानों के लिए दुखदायी हो जाता है। कैसा हो अगर आप गाड़ी में बिना हेडफोन के अपनी पसंद का गाना सुन पाएं और वह किसी और को भी ना सुनाई दे। साउंड की दुनिया की यह कल्‍पना फ्यूचर में हकीकत बन सकती है। फ्रांस में रिसर्चर्स ऐसा ही एक पर्सनल साउंड जोन देने पर काम कर रहे हैं, जो आपकी कार में कंडीशन के हिसाब से ढल जाता है।  रिसर्चर्स का मानना है कि कार में इस तरह के पर्सनल साउंड जोन से आपको बाहर की आवाज आए बिना अच्‍छी तरह से सुनने की तकनीक मिल सकती है। हर कोई कार में अपनी पसंद का म्‍यूजिक सुन सकेगा, वह भी बिना हेडफोन लगाए। जीपीएस का अलर्ट सिर्फ ड्राइवर को मिलेगा और आप इसी तरह फोन कॉल भी कर सकेंगे।    मल्‍टीपल लाउडस्पीकर की मदद से साइंटिस्‍ट पर्सनल साउंड जोन बनाने पर काम कर रहे हैं। इन मल्‍टीपल स्‍पीकर की खूबी यह है कि ये सभी एक...

अब डॉगी भी चलाएंगे ‘फोन’, DogPhone से अपने मालिक को करेंगे वीडियो कॉल

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डॉग लवर्स के साथ अक्‍सर ऐसा होता है, जब उन्‍हें उनके डॉगी को घर पर अकेला छोड़कर कुछ देर के लिए बाहर जाना पड़ता है। मुमकिन है कि फ्यूचर में जब डॉग लवर्स घर से दूर जाएंगे, तब वह अपने डॉगी का हालचाल भी ले पाएंगे। यह मुमकिन होगा आपके और आपके डॉगी के बीच वीडियो कॉल से। यह कॉल कोई और नहीं, बल्कि आपका डॉगी ही करेगा। ग्लासगो यूनिवर्सिटी की एक रिसर्चर ने ऐसी डिवाइस बनाई है, जो पालतू डॉगी को अपने मालिकों के साथ कम्‍युनिकेट करने के काबिल बनाएगी। यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ कंप्यूटिंग साइंस में एनिमल-कंप्यूटर इंटरैक्शन की विशेषज्ञ डॉ. इलीना हिर्स्कीज-डगलस, कुछ समय से अपने 10 साल के लैब्राडोर के लिए डिवाइसेज का निर्माण कर रही हैं। इसी का नतीजा है, डॉगफोन। यह एक ऐसी डिवाइस है जिसे हिर्स्कीज-डगलस ने फिनलैंड में आल्टो यूनिवर्सिटी के अपने साथ‍ियों की मदद से डिवेलप किया है। यह डिवाइस डॉगी को अपने मालिक को वीडियो कॉल करने की इजाजत देती है। यूनिवर्सिटी की तरफ से पोस्ट किए गए एक वीडियो में हिर्स्कीज-डगलस कहती हैं कि डॉगीज को कॉल का जवाब देने के लिए ट्रेंड किया गया है, लेकिन हकीकत में कोई नहीं जानता कि वीडि...

Research finds rodents could be asymptomatic carriers of SARS-like coronaviruses

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NEW JERSEY: According to a new research, ancestral rodents possibly have been infected with SARS-like coronaviruses repeatedly, which has made them form a resistance towards the pathogens. This means that they are likely to be asymptomatic carriers of SARS-like coronaviruses. Conducted by Sean King and Mona Singh of Princeton University, this research was published in 'PLoS Computational Biology Journal'. SARS-CoV-2, the virus that causes Covid-19 infection, is of zoonotic origin--it jumped from a non-human animal to humans. Previous research has shown that Chinese Horseshoe bats are a host of numerous SARS-like viruses and tolerate these viruses without extreme symptoms. Identifying other animals that have adapted tolerance mechanisms to coronaviruses is important for awareness of potential viral reservoirs that can spread new pathogens to humans. In the new research, King and Singh performed an evolutionary analysis, across mammalian species, of the ACE2 receptors, used b...