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कार्डियक अटैक के बाद हमारा हार्ट खुद कर सकता है अपना ‘इलाज’, नई स्‍टडी में दावा

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इंसान का शरीर ऐसे सिस्‍टम पर काम करता है, जिसमें वह खुद की देखभाल कर सकता है। वैज्ञानिक इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं कि हार्ट अटैक के बाद शरीर खुद को कैसे रिपेयर करता है। वैज्ञानिकों का मकसद उस नजरिए को सामने लाना है, जो ज्‍यादा प्रभावी कार्डियोवैस्कुलर थेरेपी के बारे में बताएगा। फ‍िलहाल एक नई रिसर्च में यह पता चला है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (immune response) और लसीका प्रणाली (lymphatic system यह हमारे इम्‍युन सिस्‍टम का हिस्‍सा होता है) हृदय की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचने के बाद उसकी मरम्मत करने की क्षमता रखते हैं। इसमें मैक्रोफेज की अहम भूमिका होती है। यह ऐसी विशेष कोशिकाएं हैं, जो बैक्टीरिया को खत्म कर सकती हैं। रिसर्च में पता चला है कि दिल का दौरा पड़ने के बाद मैक्रोफेज यानी विशेष कोशिकाएं VEGFC नाम का एक खास प्रकार का प्रोटीन रिलीज करती हैं। ये विशेष कोशिकाएं पीडि़त व्‍यक्ति के शरीर में मृत ऊतक या टिशू को ‘खाने' के लिए उसके हार्ट में जाती हैं। जहां वह वीईजीएफसी पैदा करती हैं। यह हार्ट से जुड़े इलाज में शरीर की मदद करता है।  दिल को पूरी तरह से ठीक करने के लिए मृ...

वैज्ञानिकों का दावा अंतरिक्ष में मौजूद हैं न दिखने वाली अदृश्य (इनविजिबल) दीवारें!

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अंतरिक्ष की दुनिया रहस्यों से भरी हुई है और वैज्ञानिकों को आए दिन अंतरिक्ष के बारे में कुछ नया पता चलता है। टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से इसकी परतों से पर्दा उठाने की कोशिश की जा रही है। अब वैज्ञानिकों ने कहा है कि अंतरिक्ष में दीवारें भी मौजूद हो सकती हैं। हालांकि, ये वैसी दीवारें नहीं है जैसे किसी कमरे की होती हैं। बल्कि, ये स्पेस में एक रुकावट के रूप में मौजूद हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन्हें बनाने में एक चौथे बल का हाथ हो सकता है जो कि एक नए कण का परिणाम हो सकता है जिसे सिम्मीट्रॉन (symmetron) कहा जाता है। इस फोर्स का अंतरिक्ष में होना वैज्ञानिकों को उन घटनाओं का खुलासा करने में मदद करेगा जिनके बारे में अब तक वे परेशान थे।  फिलहाल, हम अपने अंतरिक्ष को समझने के लिए लैम्ब्डा कोल्ड मैटर मॉडल को इस्तेमाल करते हैं। ये मॉडल कहता है कि छोटी गैलेक्सी बड़ी गैलेक्सियों के अस्त-व्यस्त ऑर्बिट में घूमती हैं। लेकिन नई स्टडी की मानें तो वास्तव में, कई छोटी गैलेक्सी, जो बड़ी गैलेक्सियों के ऑर्बिट में घूमती हैं, वे पतले फ्लैट डिस्क जैसे आकार में रखी गई हैं जो कि शनि ग्रह की रिंग्स के जैसा है...

Nasa के पूर्व साइंटिस्‍ट का दावा- अगले कुछ साल में इंसान को मिल जाएंगे एलियंस

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क्‍या पृथ्‍वी के बाहर भी जीवन मौजूद है? यह सवाल वर्षों से हमारे सामने बना हुआ है। इसी के साथ एक और प्रश्‍न सामने आता है कि क्‍या एलियंस हैं? अगर हैं तो उनका अस्तित्‍व कहां है और कब से है? वैज्ञानिक इन सवालों के जवाब खोजने में जुटे हैं। हालांकि उनके सामने अबतक कोई पुख्‍ता तथ्‍य नहीं आ पाया है। दुनिया में यह मानने वालों की कमी नहीं है कि पृथ्‍वी के बाहर भी जीवन है और एलियंस का वजूद है। ऐसा मानने वालों में नासा के एक पूर्व प्रमुख वैज्ञानिक भी शामिल हैं। एक टीवी इंटरव्‍यू में बीते दिनों उन्‍होंने कहा कि अगले कुछ साल में इंसान की मुलाकात एलियंस से होगी।     बीबीसी से बातचीत में जिम ग्रीन ने समझाया कि पृथ्वी के बाहर भी जीवन मौजूद है, इस विश्वास को व्यक्त करने के बाद इंसान वास्तव में आश्चर्यजनक खोज के करीब है। करीब 40 साल तक अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी में काम कर चुके जिम ने कहा, उन्‍हें उम्‍मीद है कि उनके जीवनकाल में एलियंस की खोज हो जाएगी। जिम ने कहा कि हम बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। अब हम यह जानते हैं कि हमारी आकाशगंगा में जितने ग्रह हैं, उससे भी कहीं अधिक तारे हैं। उन्होंने कहा कि उनमे...

वैज्ञानिकों का दावा- चंद्रमा की मिट्टी से पैदा हो सकती है ऑक्‍सीजन

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दुनिया भर के वैज्ञानिक चंद्रमा पर इंसान की स्‍थायी मौजूदगी बनाए रखने के तरीके खोज रहे हैं। इसके लिए चंद्रमा को एक्‍सप्‍लोर किया जा रहा है। इस बीच, चीन के रिसर्चर्स ने दावा किया है कि चंद्रमा की मिट्टी में ऑक्सीजन और ईंधन पैदा करने की क्षमता है। उनका कहना है कि चंद्रमा पर मिट्टी में एक्टिव कंपाउंड्स होते हैं। ये कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन और ईंधन में बदल सकते हैं। इन निष्कर्षों से पता चलता है कि चंद्रमा का सतह पर मौजूद मिट्टी का इस्‍तेमाल हाइड्रोजन और मीथेन को हासिल करने के लिए किया जा सकता है। इनकी मदद से इंसान की अहम जरूरतें पूरी हो सकती हैं और वह चंद्रमा पर रह सकता है। रिसर्चर्स का कहना है कि वो चंद्रमा में सांस लेने लायक वातावरण भी पैदा कर सकते हैं।  आने वाले वर्षों में चंद्रमा पर कई देशों के मिशनों के लैंड होने की उम्‍मीद है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) भी अपने आर्टेमिस मिशन के तहत दोबारा से अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर भेजने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का मकसद चंद्रमा को मंगल समेत अंतरिक्ष में इंसान को आगे भेजने के लिए एक गेटवे के रूप में उपयोग करना...

रिसर्चर्स का दावा, भूकंप के लिहाज से पहले से ज्‍यादा एक्टिव है मंगल ग्रह

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जितना सोचा गया है, मंगल ग्रह (Mars) उससे भी ज्‍यादा पृथ्‍वी के समान है। रिसर्चर्स को पता चला है कि यह ग्रह अपनी धूल भरी बंजर सतह के नीचे ज्वालामुखी गतिविधियों के कारण 'मार्सक्‍वेक' का अनुभव कर रहा है। यह वैसा ही है, जैसा पृथ्‍वी पर भूकंप होता है। रिसर्चर्स ने एक विशिष्ट क्षेत्र में मार्टिन क्रस्ट के नीचे 47 मार्सक्वेक की खोज की है, जिसे सेर्बरस फॉसे कहा जाता है। यह 20 मिलियन वर्ष से कम पुराना है। ये 47 मार्सक्वेक एक नई खोज के रूप में सामने आए हैं। अब से पहले वैज्ञानिकों को लगता था कि कमजोर चुंबकीय क्षेत्र वाले मंगल ग्रह के अंदर बहुत कुछ नहीं घटित हो रहा है। नई खोज यह तथ्‍य कमजोर साबित हुआ है।   आमतौर पर ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र उनके अंदर पैदा होते हैं। उदाहरण के लिए- पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र उसके बाहरी कोर में उत्पन्न होता है यह अंतरिक्ष में कई किलोमीटर तक फैला होता है। दरअसल यह ब्रह्मांड से आने वाले रेडिएशन के खिलाफ एक ढाल की तरह काम करता है।  दूसरी ओर मंगल ग्रह पर चुंबकीय क्षेत्र सिर्फ पैच में मौजूद है। यह सौर हवा के मंगल ग्रह के वातावरण के साथ इंटरेक्‍शन से बनता है। पू...

भारतीय वैज्ञानिकों का दावा, एक्टिव है मंगल ग्रह, सतह पर खोजे हजारों ट्रैक

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पूरे सौर मंडल में मंगल ग्रह को पृथ्वी का सबसे नजदीकी साथी माना जाता है। इसका आकार, ढाल और संरचना पृथ्‍वी के समान है। यह भी माना जाता है कि मंगल की सतह पर पानी हुआ करता था। इसी वजह से यह विश्‍वास बरकरार है कि मंगल ग्रह पर एक दिन जीवन मुमकिन हो सकता है। मंगल ग्रह के बारे में ज्‍यादा जानकारी हासिल करने के लिए कई मिशन आने वाले साल में लॉन्‍च किए जाने हैं, जबकि कई मिशनों को लेकर योजना बनाई जा रही है। कुछ मिशन लॉन्‍च भी हो चुके हैं, जो इस लाल ग्रह पर जीवन से जुड़ी संभावनाओं के सबूत जुटा रहे हैं। इसी कोशिश में भारतीय वैज्ञानिकों के एक ग्रुप ने मंगल ग्रह की सतह पर हजारों ऐसे ट्रैक की खोज की है, जो गिरते हुए बोल्‍डरों द्वारा बनाए गए थे। फ‍िजिकल रिसर्च लैबोरेटरी के वैज्ञानिकों को लगता है कि ये ट्रैक उन्हें मंगल ग्रह पर भूकंपीय गतिविधि को समझने में मदद कर सकते हैं। अहमदाबाद स्थित लैबोरेटरी में असिस्‍टेंट प्रोफेसर एस. विजयन के नेतृत्व में रिसर्चर्स ने साल 2006 से 2020 तक मंगल ग्रह की हाई-रेजॉलूशन इमेजेस की स्‍टडी की, ताकि हाल के गिरे बोल्डरों का पता लगाया जा सके। यह रिसर्च लेटर ‘पीयर-रिव्यू ज...